नवजात शिशु की स्क्रीनिंग क्यों है जरूरी? जन्म के बाद इन जांचों से समय रहते पता चल सकती हैं कई गंभीर बीमारियां

बच्चे का जन्म किसी भी परिवार के लिए बेहद खुशी का पल होता है। जन्म के बाद माता-पिता का पूरा ध्यान बच्चे की सेहत, दूध पिलाने और उसकी देखभाल पर रहता है। हालांकि, कई बार नवजात शिशु बाहर से पूरी तरह स्वस्थ दिखाई देता है, लेकिन उसके शरीर में ऐसी स्वास्थ्य समस्या मौजूद हो सकती है जिसके लक्षण शुरुआत में नजर नहीं आते। ऐसी स्थितियों की समय रहते पहचान करने में Newborn Screening यानी नवजात शिशु की स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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नवजात स्क्रीनिंग ऐसी जांचों का समूह है, जिनकी मदद से जन्म के शुरुआती दिनों में कुछ जन्मजात बीमारियों, मेटाबॉलिक डिसऑर्डर और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के संकेतों का पता लगाया जा सकता है। भारत में भी नवजात शिशुओं की शुरुआती जांच और जन्मजात दोषों की पहचान पर जोर दिया जा रहा है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के तहत डिलीवरी प्वाइंट्स पर Comprehensive Newborn Screening के जरिए जन्मजात दोषों की पहचान की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। (RBSK)

क्या होती है Newborn Screening?

Newborn Screening का मतलब है बच्चे के जन्म के तुरंत बाद या शुरुआती दिनों में कुछ जरूरी स्वास्थ्य जांच करना। इसका उद्देश्य बीमारी का अंतिम निदान करना नहीं, बल्कि उन बच्चों की पहचान करना है जिन्हें आगे की जांच या विशेषज्ञ चिकित्सा की जरूरत हो सकती है।

कई जन्मजात या आनुवंशिक बीमारियों में शुरुआती दिनों में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते। बच्चा सामान्य रूप से दूध पी सकता है, सो सकता है और देखने में बिल्कुल स्वस्थ लग सकता है। लेकिन समय बीतने के साथ बीमारी के लक्षण सामने आ सकते हैं।

ऐसे में शुरुआती स्क्रीनिंग डॉक्टरों को संभावित समस्या की पहचान करने और जरूरत पड़ने पर आगे की जांच कराने में मदद कर सकती है।

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जन्म के बाद स्क्रीनिंग क्यों जरूरी है?

नवजात अवस्था में बच्चे का शरीर तेजी से विकसित हो रहा होता है। कुछ बीमारियां यदि शुरुआती समय में पहचान ली जाएं तो उनका प्रबंधन जल्दी शुरू किया जा सकता है। इससे गंभीर जटिलताओं को कम करने और बच्चे के विकास को बेहतर तरीके से मॉनिटर करने में मदद मिल सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी जून 2026 में नवजात स्क्रीनिंग, डायग्नोसिस और उपचार को नियमित स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने तथा देश की प्राथमिकताओं के अनुसार ऐसी स्थितियों से शुरुआत करने पर जोर दिया है जिन्हें प्रभावी रूप से पहचाना और संभाला जा सकता है। (World Health Organization)

भारत सरकार के RBSK कार्यक्रम का उद्देश्य भी बच्चों में जन्मजात दोष, बीमारियां, पोषण संबंधी कमियां और विकास में देरी जैसी समस्याओं की शुरुआती पहचान तथा जरूरत के अनुसार उपचार और हस्तक्षेप से जोड़ना है। RBSK के अनुसार नवजात शिशुओं में जन्मजात दोषों की स्क्रीनिंग स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टरों तथा घर पर ASHA कार्यकर्ताओं के माध्यम से भी की जा सकती है। (RBSK)

किन समस्याओं की हो सकती है पहचान?

Newborn Screening में जांचों का पैनल अस्पताल, राज्य, उपलब्ध सुविधाओं और बच्चे के जोखिम के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। इसलिए हर अस्पताल में होने वाली जांचों की सूची समान नहीं होती।

कुछ कार्यक्रमों में Congenital Hypothyroidism, कुछ आनुवंशिक या मेटाबॉलिक बीमारियों और अन्य जन्मजात स्थितियों की जांच शामिल हो सकती है। जिन परिवारों में किसी विशेष दुर्लभ बीमारी का इतिहास रहा हो, वहां डॉक्टर बच्चे के लिए अतिरिक्त जांच की सलाह दे सकते हैं।

भारत की National Policy for Rare Diseases में भी कुछ परिस्थितियों में परिवार में पहले से पुष्टि की गई दुर्लभ बीमारी के इतिहास वाले नवजात या बच्चों के लिए विशेष स्क्रीनिंग और डायग्नोसिस का प्रावधान बताया गया है। (Ministry of Health and Family Welfare)

Heel Prick Test क्या होता है?

नवजात स्क्रीनिंग में सबसे चर्चित प्रक्रियाओं में से एक Heel Prick Test है। इसमें बच्चे की एड़ी से बहुत थोड़ी मात्रा में खून लेकर विशेष कार्ड या सैंपल में जांच के लिए भेजा जाता है।

इस प्रक्रिया में बच्चे को थोड़ी देर के लिए असहजता हो सकती है और वह रो सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया बहुत कम मात्रा में रक्त लेकर की जाती है। जांच की सही टाइमिंग और जांचों का पैनल अस्पताल या डॉक्टर की सलाह के अनुसार अलग हो सकता है।

माता-पिता को यह समझना चाहिए कि स्क्रीनिंग टेस्ट का परिणाम हमेशा बीमारी की पुष्टि नहीं करता। यदि किसी जांच में संभावित समस्या दिखाई देती है, तो डॉक्टर आमतौर पर आगे की confirmatory testing की सलाह देते हैं।

सिर्फ खून की जांच ही नहीं होती स्क्रीनिंग

नवजात स्क्रीनिंग को केवल ब्लड टेस्ट तक सीमित नहीं समझना चाहिए। बच्चे की शुरुआती जांच में डॉक्टर शारीरिक परीक्षण के जरिए भी कई जन्मजात समस्याओं के संकेत देख सकते हैं।

RBSK के तहत Comprehensive Newborn Screening में जन्मजात दोषों की पहचान का प्रावधान है। इसके बाद जरूरत के अनुसार बच्चे को आगे की चिकित्सा व्यवस्था और विशेषज्ञ सेवाओं से जोड़ा जा सकता है। (RBSK)

कुछ अस्पतालों में बच्चे की सुनने और आंखों से संबंधित जांच, ऑक्सीजन सैचुरेशन जैसी जांच या अन्य क्लीनिकल मूल्यांकन भी किए जा सकते हैं। हालांकि, कौन-सी जांच आवश्यक है, यह बच्चे की स्थिति और डॉक्टर की सलाह पर निर्भर करता है।

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अगर रिपोर्ट सामान्य न आए तो क्या करें?

स्क्रीनिंग रिपोर्ट में किसी संभावित समस्या का संकेत मिलने पर माता-पिता को घबराना नहीं चाहिए। Screening और diagnosis दो अलग-अलग चीजें हैं।

कई बार किसी सैंपल की तकनीकी वजह से दोबारा जांच की जरूरत पड़ सकती है। वहीं कुछ मामलों में डॉक्टर बीमारी की पुष्टि के लिए अधिक सटीक टेस्ट करवाते हैं।

अगर स्क्रीनिंग में कोई संभावित समस्या आती है तो डॉक्टर से यह पूछना जरूरी है कि:

  • कौन-सी जांच में बदलाव आया है?
  • क्या दोबारा टेस्ट करना है?
  • क्या confirmatory test की जरूरत है?
  • किस विशेषज्ञ से मिलना चाहिए?
  • इलाज या निगरानी की अगली प्रक्रिया क्या होगी?

समय पर follow-up करना बहुत महत्वपूर्ण है।

भारत में शुरुआती जांच को मिल रहा है महत्व

भारत में बच्चों की शुरुआती स्वास्थ्य जांच के लिए RBSK जैसी सरकारी पहल मौजूद है। मंत्रालय के अनुसार RBSK का उद्देश्य 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों में 4Ds—Defects at Birth, Diseases, Deficiencies और Developmental Delays—की शुरुआती पहचान करना है। कार्यक्रम में 32 सामान्य स्वास्थ्य स्थितियों को शामिल किया गया है और जरूरत के अनुसार बच्चों को शुरुआती हस्तक्षेप तथा उपचार से जोड़ा जाता है। (RBSK)

सरकारी कार्यक्रमों के अलावा कई अस्पताल और चिकित्सा संस्थान भी अपने स्तर पर Newborn Screening Packages उपलब्ध कराते हैं। हालांकि, हर पैकेज में शामिल जांच अलग हो सकती हैं। इसलिए माता-पिता को केवल पैकेज का नाम देखकर निर्णय लेने के बजाय यह जानना चाहिए कि उसमें कौन-कौन से टेस्ट शामिल हैं।

माता-पिता को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

बच्चे के जन्म के बाद अस्पताल से छुट्टी मिलने से पहले माता-पिता को डॉक्टर से पूछना चाहिए कि बच्चे की कौन-कौन सी शुरुआती जांच हो चुकी है और आगे कौन-सी जांच जरूरी है।

परिवार में किसी आनुवंशिक या दुर्लभ बीमारी का इतिहास हो तो डॉक्टर को इसकी जानकारी जरूर दें। इससे डॉक्टर यह तय कर सकते हैं कि बच्चे को सामान्य स्क्रीनिंग के अलावा किसी अतिरिक्त जांच की आवश्यकता है या नहीं।

साथ ही, स्क्रीनिंग रिपोर्ट और बच्चे की मेडिकल फाइल को सुरक्षित रखना चाहिए। भविष्य में किसी अन्य डॉक्टर से सलाह लेते समय ये रिपोर्ट उपयोगी हो सकती हैं।

हर नवजात के लिए जरूरी संदेश

नवजात शिशु की स्क्रीनिंग का सबसे बड़ा फायदा यही है कि कुछ ऐसी स्वास्थ्य समस्याओं की संभावना का संकेत शुरुआती अवस्था में मिल सकता है, जिनके लक्षण बाद में दिखाई देते हैं। शुरुआती पहचान का मतलब हमेशा बीमारी का इलाज संभव होना नहीं है, लेकिन इससे डॉक्टरों को समय पर आगे की जांच, निगरानी और उपचार की योजना बनाने का अवसर मिल सकता है।

इसलिए माता-पिता को बच्चे को केवल बाहरी रूप से स्वस्थ देखकर सभी जांचों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बच्चे के जन्म के बाद अस्पताल में उपलब्ध Newborn Screening के बारे में डॉक्टर या बाल रोग विशेषज्ञ से जानकारी लेना एक समझदारी भरा कदम है।

निष्कर्ष: जन्म के बाद शुरुआती स्वास्थ्य जांच नवजात की देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है। सही समय पर स्क्रीनिंग, जरूरत पड़ने पर पुष्टि वाली जांच और समय पर उपचार—ये तीनों मिलकर बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, हर बच्चे के लिए जरूरी जांचें अलग हो सकती हैं, इसलिए जांचों का चुनाव हमेशा योग्य बाल रोग विशेषज्ञ या नवजात विशेषज्ञ की सलाह से किया जाना चाहिए।

5 महत्वपूर्ण FAQs

1. Newborn Screening क्या है?
Newborn Screening जन्म के बाद शुरुआती दिनों में की जाने वाली जांचों का समूह है, जिसका उद्देश्य कुछ जन्मजात, आनुवंशिक, मेटाबॉलिक या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के शुरुआती संकेतों की पहचान करना है।

2. क्या हर स्वस्थ दिखने वाले बच्चे की स्क्रीनिंग जरूरी है?
बच्चा बाहर से स्वस्थ दिखाई देने के बावजूद कुछ समस्याएं शुरुआती दिनों में बिना लक्षण के हो सकती हैं। इसलिए माता-पिता को डॉक्टर से Newborn Screening की उपलब्धता और बच्चे के लिए जरूरी जांचों के बारे में जरूर पूछना चाहिए।

3. Heel Prick Test में क्या होता है?
इस टेस्ट में बच्चे की एड़ी से थोड़ी मात्रा में रक्त का सैंपल लिया जाता है और उसे निर्धारित जांचों के लिए भेजा जाता है। टेस्ट की टाइमिंग और जांचों का पैनल अस्पताल व चिकित्सा व्यवस्था के अनुसार अलग हो सकता है।

4. अगर Newborn Screening रिपोर्ट में समस्या आए तो क्या बीमारी पक्की होती है?
नहीं। Screening में किसी संभावित समस्या का संकेत मिलने पर बीमारी की पुष्टि के लिए आगे के diagnostic या confirmatory tests की जरूरत पड़ सकती है।

5. माता-पिता को जन्म के बाद डॉक्टर से क्या पूछना चाहिए?
माता-पिता पूछ सकते हैं कि बच्चे की कौन-कौन सी जांच हो चुकी है, कौन-सी जांच आगे करनी है, रिपोर्ट कब मिलेगी और यदि किसी टेस्ट में बदलाव आता है तो आगे की प्रक्रिया क्या होगी।

डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। Newborn Screening के टेस्ट, समय और जरूरत बच्चे की स्थिति, जन्म के समय, पारिवारिक इतिहास तथा स्थानीय चिकित्सा सुविधाओं के अनुसार अलग हो सकते हैं। किसी भी जांच या उपचार का निर्णय बाल रोग विशेषज्ञ/नवजात विशेषज्ञ की सलाह से ही लें।

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